राष्ट्रीय - राजस्थान : रेत का जर्रा-जर्रा जानता है 5 सालों में सरकार से हिसाब लेना, जातिगत समीकरण ऐसा कि बदल दे इतिहास

राजस्थान : रेत का जर्रा-जर्रा जानता है 5 सालों में सरकार से हिसाब लेना, जातिगत समीकरण ऐसा कि बदल दे इतिहास



Posted Date: 06 Nov 2018

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नई दिल्ली। राजस्थान में इन दिनों चुनावी घमासान जोरों पर है। साल 2018 के लिए यहां विधानसभा चुनावों का ऐलान हो चुका है। 2013 में वसुंधरा राजे की सरपरस्ती में यहां बीजेपी ने अपना झंडा गाड़ने में सफलता हासिल की थी। लेकिन इस बार इतिहास खुद को दोहराएगा इस बात की राजस्थान कभी किसी को कोई गारंटी नहीं देता है। राजस्थान में जातिगत समीकरणों को देखते हुए ऐसा कह सकते हैं कि यहां रेत का जर्रा-जर्रा सरकारों से 5 सालों का हिसाब लेना जानता है।

सदियों पुराने राजाओं-महाराजाओं का इतिहास समेटे हुए राजस्थान की रेत कब बवंडर में तब्दील होकर किसे नेस्तोनाबूद करेगी कोई नहीं जानता। करीब सात करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले इस प्रदेश में कुल 272 जातियां हैं। जिनमें से मुख्य रुप से राजपूत, जाट, गुर्जर और मीणा शामिल हैं।

ऐसे में यहां एकतरफ जहां गुर्जर और मीणा समुदाय को एकदूसरे का विरोधी माना जाता है तो वहीं दूसरी तरफ यहां की राजनीति में जाटों और राजपूतों का भी कम बोलबाला नहीं है। राजस्थान में जातीय समीकरणों के बीच इस बार यहां का चुनावी ऊंट किस करवट बैंठेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन जिन चार समुदायों की मुठ्ठी में बंद है राजस्थान की राजनीति का भविष्य आइए उनके बारे में जानते हैं कुछ अहम बातें...

गुर्जर समुदाय

परंपरागत रूप से गुर्जर समुदाय का समर्थन भारतीय जनता पार्टी को हासिल है। लेकिन इस समुदाय के सबसे बड़े नेता सचिन पायलट कांग्रेस के नेता हैं। दरअसल, साल 1980 में गुर्जर समुदाय के राजेश पायलट कांग्रेस के टिकट पर भरतपुर से सांसद चुने गए और बीजेपी के लिए यहीं से मामला गड़बड़ाना शुरू हो गया। पहले राजेश पायलट और अब सचिन पायलट के होने से गुर्जर समुदाय का वोट बैंक बीजेपी से कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होता देखा जा रहा है क्योंकि गुर्जर समुदाय अब सचिन पायलट को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा हुआ देखने की आस लगाए हुए हैं।

इसके अलावा बीजेपी से नाराजगी का एक कारण गुर्जर समुदाय के पास यह भी है कि बीजेपी गुर्जरों को आरक्षण दिलाने में भी असफल रही है। ऐसे में एक और कांग्रेस से सचिन पायलट हैं तो दूसरी और बीजेपी से किरोड़ी सिंह बैंसला हैं। दोनों बड़े नेता हैं और ऐसे में गुर्जर समुदाय का वोट दोनों पार्टियों के बीच बंट भी सकता है।

मीणा समुदाय

राजस्थान में गुर्जर और मीणा समुदाय को एक दूसरे का विरोधी माना जाता है। ऐसे में जहां गुर्जर परंपरागत रूप से बीजेपी के साथ माने जाते हैं तो मीणा परंपरागत रूप से कांग्रेस की तरफ देखे जाते हैं। लेकिन राजनीति में उथल-पुथल न हो तो वो राजनीति नहीं मानी जाती है। अब जहां गुर्जर कांग्रेस की तरफ जा रहे हैं तो वहीं बीजेपी मीणा समुदाय को अपनी ओर खींचने में लगी है। साल 2008 में किरोड़ी लाल मीणा ने वसुंधरा राजे के साथ मतभेद के चलते बीजेपी छोड़ दी थी। अब मीणा वोटरों को लुभाने के लिए बीजेपी ने किरोड़ी लाल मीणा को दोबारा पार्टी में शामिल किया है।

राजपूत समुदाय

राजस्थान चुनावों में राजपूत समुदाय काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। काफी हद तक इस बात की संभावना रहती है कि ये बीजेपी के पक्ष में ही वोट करेंगे। लेकिन इस बार बीजेपी के लिए राजपूत ही मुश्किल खडी कर सकता हैं। जिसकी मुख्य वजह गैंगस्टर आनंदपाल सिंह का एनकाउंटर बन सकती है।

दरअसल, गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर के विरोध में राजपूत समुदाय के लोगों ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किया था। लोगों का कहना था कि इस मामले में सरकार ने उनका साथ नहीं दिया। ऐसे में इस बार वसुंधरा सरकार के राजपूत वोट भी कटते दिखाई दे रहे हैं।

जाट समुदाय

राजस्थान की राजनीति में जाटों का शुरू से जलवा देखने को मिला है। राज्य के शेखावटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनूं, चूरू) के साथ ही पश्चिमी राजस्थान कहने जाने वाले मारवाड़ (बारमेड़, नागौर) में इस समुदाय की पकड़ है। राजस्थान में जाटों को काफी चतुर समुदाय के वोटर के तौर पर देखा जाता है।

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ऐसा इसलिए क्योंकि इस समुदाय के लोग वक्त की नजाकत देखकर वोट करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि लहर जिस ओर होगी, इस समुदाय का वोट उसी तरफ होगा। हालांकि पारंपरिक तौर पर जाट समुदाय को कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है। लेकिन अब ये समुदाय बीजेपी और कांग्रेस दोनों के बीच बंट गया है।

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BY : Indresh yadav


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