विशेष - इंसानियत के चरम को लांघती आधुनिकता!

इंसानियत के चरम को लांघती आधुनिकता!



Posted Date: 11 Jan 2019

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लोग कहते हैं कि आज हम आधुनिक हो गए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में हो या फिर कला के क्षेत्र में। बात सटीक है और सत्य भी, जिसे नकारा नहीं जा सकता। 

शिक्षा का शायद ही कोई क्षेत्र अछूता रह गया हो जिस पर इंसान ने महारत हासिल न की हो। नाचने वाले पहिये से लेकर आज हमनें रॉकेट तक बनाए। मीलों की दूरियों को समेट देने वाले डिवाइसेज़ के साथ उन पर काबू पाने वाले माध्यम भी विकसित किए।

आत्मरक्षा के लिए विध्वंसक और विस्फोटक भी इजाद कर डाले। इस कामना के साथ कि हमारा कल आज से बेहतर होगा। आज भी निरंतर इसका प्रयास जारी है।

समय के साथ इस काम को आगे बढ़ाने वाले लोग जरूर बदल गए हैं पर वो सोच अभी जिंदा है और इसी जिंदा सोच के साथ हर दिन किए जाने वाले नए प्रयोग हमें पहले से और ज्यादा आधुनिक बना रहे हैं।

बता दें यह प्रयोग कई दिशा में और अलग-अलग क्षेत्र में हो रहे हैं और क्षेत्र विशेष के साथ-साथ इन प्रयोगों के मायनें भी पृथक हो जाते हैं। पर इन सबका उद्देश्य एकमात्र है- ‘विकास’।

ये तो हो गईं ज्ञान परक बातें, जिनसे रूबरू कराना अतिआवश्यक था क्योंकि किसी भी विषय के मूल को जाने बिना उसका सार समझ पाना नामुमकिन सा होता है। ठीक उसी तरह जैसे कि सीरियल के एक अंश को देखने मात्र से उसके किरदारों की असल भूमिका समझ पाना कठिन होता है।

तो अब आते हैं मुद्दे की बात पर...

तो बात ये है कि आज के समय में आधुनिकता इंसानी जीवन पर इस कदर हावी होती जा रही है कि इंसान इंसानियत के असल मूल को ही भूल सा गया है।

अतः इस प्रकरण को अधिक गहराई से समझने के लिए हम नज़र डालते हैं आज के समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों और समाचार वेबसाइटों पर जो वर्तमान परिपेक्ष से जनता को रूबरू कराने में अपना अभिन्न योगदान देते हैं और बताते हैं कि आखिर समाज में चल क्या रहा है? समाज विकास और आधुनिकता के किस पथ पर अपने कदम बढ़ा रहा है?

अब बात करते हैं उन ताज़ा मामलों की जो बीते कई दिनों से सुर्ख़ियों में बने हैं। ये मामले हैं लोकसभा चुनाव, राममंदिर, सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण, मॉब लिंचिंग और रेप जैसी घटनाओं के। इन सभी मामलों का ज़िक्र भले ही दो लाइनों में सिमट गया हो लेकिन इनका विवरण इतना सरल नहीं।

इन सभी मामलों पर एक सिरे से प्रकाश डालने बैठिए तो कई डायरियों के पन्ने खत्म हो जाएंगे और कई कलमों की स्याही दम तोड़ देगी। खैर समझने वाली बात ये है कि आधुनिकता इंसानियत पर हावी कैसे हो रही है?

इसे बारीकी से समझने के लिए डालते हैं कुछ अहम मुद्दों पर नज़र...

ज़िक्र लोकसभा चुनावों का...

साल 2014 में भाजपा ने एक ऐसा चेहरा पेश किया जिसे जनता ने अपने सिर पर बिठाया और केंद्र में भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ आई। धीरे-धीरे उस वक्त पनपी लहर का एक ऐसा झोंका आया जो ‘मोदी’ नाम की आंधी में बदल गया।

इसका असर कुछ यूं हुआ कि धर्म विशेष की राजनीति एक बार फिर सियासी गलियारों में कुलबुलाने लगी। जनता के बीच मोदी की शख्सियत बतौर लोकतांत्रिक देश के पीएम की जगह हिंदू विचारधारा से प्रेरित तानाशाह की बन गई।

हालांकि पीएम मोदी का ऐसा कोई विशेष धर्म के प्रति रूझान का मन्तव्य न रहा होगा और न है। लेकिन उनके या उनकी सरकार द्वारा उठाए कदमों का जनता ने आप ही निष्कर्ष निकाल लिया कि केंद्र शासित मोदी सरकार हिंदूवादी विचारधारा से ओत-प्रोत है और अन्य धर्मों खासकर अल्पसंख्यक के तौर पर मुस्लिम विरोधी है।

ऐसे में सवाल इस बात का उठता है कि आधुनिकता के इस दौर में धर्म विशेष को लेकर इतना द्वेष क्यों?

आखिर क्यों हिंदू और मुस्लिम के बीच घुला ज़हर कम होने का नाम नहीं ले रहा? क्या इतिहास से सीख लेकर हम आज भी उस द्वेष रूपी ज़हर को मन से नहीं निकाल पा रहे हैं? जिसकी वजह से सोने की चिड़िया कहे जाने वाले हमारे भारतवर्ष को 100 साल तक गुलामी की बेड़ियों में बंधने को मजबूर होना पड़ा।

हर क्षेत्र में खुद को आधुनिक कहने वाले हम भारतीय इस धर्मद्वेष और सांप्रदायिक राजनीति वाले मामले में उबर पाने में खुद को आधुनिक नहीं बना पा रहे।

गौर करें तो इसकी जड़ भी आधुनिकता में ही छिपी है, जो इंसान से इंसानियत को छीनने का काम कर रही है।

नहीं समझे? बात कर रहे हैं सोशल मीडिया की। वो कहते हैं न कि कोई भी नई चीज़ जिसे अच्छाई के लिए शुरू किया जाता है, अपने साथ कुछ न कुछ बुराईयां लेकर आती है।

इसे हम सोशल मीडिया न कहकर सोशल प्लेटफॉर्म कहें तो ज़्यादा बेहतर होगा, क्योंकि सोशल मीडिया का अर्थ कई कुंद बुद्धि वाले लोग ऑनलाइन समाचार वेबसाइटों से लगा लेंगे।

जानकारी के लिए बता दें कि सोशल मीडिया शब्द का तात्पर्य उन सभी माध्यमों से है, जिन्हें लोग व्यक्तिगत संचार माध्यम के तौर पर प्रयोग में लाते हैं। जैसे: फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर इत्यादि।

इन माध्यमों का उद्भव जहां मीलों की दूरियों को कम करने के लिए हुआ था, वहीं आज इनका उपयोग गलत सूचनाओं को बांटने और भ्रम फैलाने के लिए किया जा रहा है। जो इंसानी सोच को इस कदर कुंद और कुंठित कर रहा है कि लोग खुद के विकास के बजाय दूसरों के पतन के बारे में मंथन करने में जुटे हैं।

ज़िक्र राममंदिर का...

राममंदिर का ज़िक्र इन दिनों फिर जोर पकड़ता जा रहा है। जहां एक ओर विपक्षी दल केंद्र सरकार पर इसके निर्माण को लेकर लगातार हमलावर हैं। वहीं साधू-संत और हिंदू समुदाय इस मामले को लेकर व्यक्तिगत होकर मंदिर निर्माण का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इतना ही नहीं कई संगठनों ने तो इस मांग के पूरा न होने की स्थिती में हिंसा और प्रदर्शन जैसे हथकंडों का प्रयोग करने की चेतावनी तक दी है।

ऐसे में यदि हम खुद को आधुनिक कहें, धर्मांध ना होने का दम भरें, साम्प्रदायिक भाईचारे की बात करें और वहीं दूजी ओर मन ही मन इन विचारों के साथ द्वेष पालते रहें तो ये कौन सी आधुनिकता होगी? इसका अर्थ तो यही हुआ न कि पाप को जन्म देकर हम सत्संग और सद्भाव की बात कर रहे हैं।     

ज़िक्र सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का...

हाल ही में सामन्य वर्ग के गरीब तबके को दी गई केंद्र द्वारा ये सौगात भी कहीं न कहीं हमारे आधुनिक न होने का प्रमाण देती है। जिन कुरीतियों और बुराइयों की मलिनता को इंसान के जहन से मिटाने के लिए संविधान में आरक्षण को जगह दी गई थी। अब वह निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल की जाने लगी है। चुनावी समय में लोगों को रिझाने का पर्याय बन गई। यदि आज भी मन में ऐसे ही भाव घर किये हुए हैं, तो फिर आधुनिकता कहां है?  

मॉब लिंचिंग...

हाल ही में मॉब लिंचिंग जैसा शब्द चलन में आया और लोगों में भी इसे समझने को लेकर उत्सुकता पनप गई। मतलब है किसी व्यक्ति विशेष या समूह को भीड़ द्वारा घेर कर इस हद तक प्रताड़ित करना, जब तक जान ना चली जाए।

कारण कुछ भी रहा हो... चोरी, डकैती, लूटमार या छेड़छाड़। ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद ज़हन में ये सवाल जरूर उठता है कि खुद को आधुनिक तो कह रहा है इंसान पर जो कर रहा है क्या वो इंसानियत की ओर इशारा करता है? आखिर किसने ये अधिकार दे दिया कि किसी भी इंसान के कर्मों का फल इस तरह से दिया जाना ही न्याय है? फिर भी कहते हैं... हम आधुनिक हैं। 

जिक्र रेप की घटनाओं का...

जैसे-जैसे आधुनिकता की सीढ़ियों पर इंसानी कदम बढ़ता जा रहा है, महिलाओं के संग रेप, यौन शोषण, छेड़छाड़ के मामले आग की लपटों की तरह हर दिशा में फैलते जा रहे हैं। कारण पूछो तो जवाब कई आते हैं... छोटे कपड़े पहने थे तो ऐसा हुआ, रात में निकली थी तो ऐसा हुआ, ज्यादा आधुनिक हो गई थी इसलिए ऐसा हुआ। अरे! ये कैसी आधुनिकता है कि महिलाओं के चाल, चरित्र और चित्रण का पर्याय उनके कपड़ों से लगाया जाता है?

सोचने वाली बात है कि लग्ज़ीरियस डिवाइसेस, स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, घोड़ा-गाड़ी और इंटरनेट जैसी सुविधाएं हासिल कर लेना ही आधुनिकता का प्रमाण है। क्या ज़हन को और कुंठित सोच को आधुनिक किए जाने की ज़रूरत नहीं महसूस होती?


BY : Ankit Rastogi