राजनीति - BJP के वोट बैंक का नया फंडा क्या सवर्णों को दिला पाएंगा आरक्षण? इतिहास नहीं दे रहा इजाजत

BJP के वोट बैंक का नया फंडा क्या सवर्णों को दिला पाएंगा आरक्षण? इतिहास नहीं दे रहा इजाजत



Posted Date: 07 Jan 2019

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नई दिल्ली। केंद्र की सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार ने सोमवार को सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण का ऐलान कर दिया। सभी को यह पता है कि आगामी लोकसभा चुनाव पास ही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बीजेपी का यह नया पैतरा सवर्णों को अपने वोट बैंक की तरफ खींचने का है।

यह ऐलान करने में जितना आसान है उतना ही इसे लागू करने की राह मुश्किल है। अगर भारत के संविधान पर नजर डाले तो, आरक्षण का पैमाना सामाजिक समानता है और किसी आय या संपत्ति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाता। संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार, आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है और किसी व्यक्ति को नहीं। अब सरकार मंगलवार को संविधान में संशोधन प्रस्ताव लाएगी और उसके आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन इसका हाल वहीं हो सकता है जो इससे पहले हो चुका है।

इससे पहले अप्रैल 2016 में भी गुजरात सरकार ने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। सरकार के इस फैसले के अनुसार 6 लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों को इस आरक्षण के अधीन लाने की बात कही गई थी। हालांकि अगस्त 2016 में हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक बताया था।

इसी तरह साल 2015 में राजस्थान सरकार ने अनारक्षित वर्ग के सरकारी नौकरियों में 14 फीसदी आरक्षण, 1978 में बिहार में सवर्णों को तीन फीसदी का आरक्षण और 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी। लेकिन इन सभी प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी और असंवैधानिक बता कर निरस्त कर दिया था।

संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होने की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय कर रखी है और संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है। अब सरकार को इसे लागू करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना होगा। जिसे संविधान में संसोधन कर दूर करना होगा।

अगर मान भी ले की यह आरक्षण का पैमान एक सदन में पास भी हो गया तो इसे दूसरे सदन का सामना करना होगा। जिसमे इसे रुकावटों का सामना करना होगा। इन सब के अलावा सरकार के पास विधेयक पारित करने का अधिकार है। जिसे सरकार संसद में आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई श्रेणी के प्रावधान वाला विधेयक लाकर पास करा सकती है।

अब देखना होगा कि सरकार का यह नया वादा धरातल पर आयेगा या फिर तीन तलाक और राम मंदिर की तरह त्रिशंकु की भांति बीच में ही लटका रहेगा और वोट बटोरने के लिए भ्रमास्त्र का काम करेगा?


BY : ANKIT SINGH