विशेष - जरा संभलकर… कहीं जीवन को निगल ना जाए मनोरंजन का ये नया ट्रेंड!

जरा संभलकर… कहीं जीवन को निगल ना जाए मनोरंजन का ये नया ट्रेंड!



Posted Date: 05 Jan 2019

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लखनऊ। हम अक्सर सुनते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जोकि धरती पर मौजूद सभी प्राणियों पर लागू होता है। यह कहा भी जाता है कि हमें परिवर्तनशील समय के साथ अपने भीतर भी बदलाव करना चाहिए। लेकिन कभी-कभी बदलाव लाने की लालसा भविष्य में पनपने वाले अंधकार को बढ़ावा दे जाती है, जिसकी उस वक्त किसी को भनक भी नहीं लगती।

यहां हम बात कर रहे हैं मनोरंजन और उसके बदलते स्वरुप की। जो आज बदल कर वेबसीरीज के रूप में पेश किया जा रहा है। इन वेबसीरीज में अधिकतर नकारात्मक किरदार को सभी के सामने पेश किया जाता है, जिसका असर युवा दर्शकों पर बुरा प्रभाव डालने वाला दिखाई देता है।

कुछ ही समय पहले आए वेबसीरीज के ट्रेंड ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी करना शुरु कर दिया है। युवाओं में तो इसका असर और भी अधिक देखने को मिल रहा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि वेबसीरीज के अधिकतर मुख्य पात्र युवा औऱ पॉवरफुल लाइफ जीते नज़र आते हैं। पूरी सीरीज इन्हीं किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।

भले ही इन किरदारों की छवि नकारात्मक हो औऱ अंजाम पुलिस की गोली से मौत हो, लेकिन जब एक युवा दर्शक को फिल्म में शुरुआत से लेकर अंत तक यह दिखाई देता है कि कैसे एक युवा लड़का पूरे के पूरे शहर को अपनी बंदूक की नली पर दहलाने का माद्दा रखता है।

विधायिका से लेकर न्यायपालिका तक सभी इस युवा से भय और खौफज़दा रहते हैं। तो ऐसे किरदारों से दर्शकों पर बुरा प्रभाव पड़ना लाज़मी है। पिछली कुछ वेबसीरीज का नाम ले तो सैक्रेड गेम्स, मिर्ज़ापुर, रंगबाज और अपहरण जैसी फिल्मों में कुछ ऐसे ही किरदार पेश किये गये हैं।

इन सभी वेबसीरीज के मुख्य पात्र का कैरेक्टर प्ले कर रहे कलाकारों की जुबां पर गाली और हाथ में गोली रहती हैं। उम्र भी 20 से 25 के बीच और दिमाग क्राइम की सभी हदें पार करने पर लगा रहता है। खास बात यह कि इन सभी वेबसीरीज में जिस प्रकार की भाषा शैली और आपत्तिजनक दृश्यों को दिखाया जा रहा है, क्या वह हमारे समाज में बुरा प्रभाव नहीं डालेगा? अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें बुरा क्या?

आखिर ऐसा कहने के पीछे का मंतव्य क्या है? तो बता दूं कि मनोरंजन इंसानी जीवन का एक अहम हिस्सा है। बिना इसके जीवन अधूरा सा जान पड़ता है। या यूं कह सकते हैं कि ये उस रिफ्रेशमेंट टॉनिक की तरह है, जिसको काफी थकान और मानसिक तनाव के बाद पीने की जरूरत पड़ती है। लेकिन फिल्में सिर्फ मरनोरंज तक सीमित नहीं है। इससे कुछ सीखा और कुछ सिखाया भी जाता है।

अगर 70 से 90 के दशक की फिल्मों को देखें तो सभी में मुख्य किरदार को गरीबी की मार झेलने और इसके बावजूद कड़ी मेहनत के बल पर इज्जतदार और सम्मानजनक जीवन बिताने वाले व्यक्ति का मुकाम हासिल करते दिखाई देते थे। जिससे समाज पर सकारात्मक संदेश जाता था। वहीं बाद की कुछ फिल्मों हीरो को नकारात्मक भूमिका में दिखाया गया। धूम जैसी फिल्मों में हीरो को चोर की भूमिका में रखा गया। इसका असर भी देखने को मिला औऱ कई जगहों से तो आधुनिक चोरियों के कई किस्से भी सुनाई दिये।

हालिया उदाहरण ले तो आगरा के बहुचर्चित संजली हत्याकांड को अंजाम देने के भाई योगेश ने क्राइम पेट्रोल नामक टीवी सीरियल से अपराध को अजाम देने के लिए कहानी ली। बाद में उसने अपनी ही चचेरी बहन को सुनसान इलाके में पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया।

यहां गौर करने वाली बात है कि क्या मनोरंजन का प्रमुख मार्ग यानी सिनेमा अब अपराध और फिर बचने के उदाहरण तो नहीं पेश कर रहा है। आज के युवाओं को भी यहां ध्यान देना होगा कि वेबसीरीज और फिल्मों में दिखाए जाने वाले किरदारों के अंत में क्या अंजाम होता है। क्या आखिर में उसे सम्मानजनक जिंदगी या मौत मिलती है?


BY : shashank pandey