विशेष - सुन्दरलाल बहुगुणा : पद्मश्री पुरस्कार को स्वीकार न करने का साहस दिखाने वाले ‘वृक्षमित्र’

सुन्दरलाल बहुगुणा : पद्मश्री पुरस्कार को स्वीकार न करने का साहस दिखाने वाले ‘वृक्षमित्र’



Posted Date: 09 Jan 2019

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पर्यावरण के रक्षक के रुप में विश्व प्रसिद्ध एवं चिपको आंदोलन के प्रमुख नेता सुन्दरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी, 1927 को हुआ था। उत्तराखंड के सिलयारा नामक स्थान पर जन्म सुन्दलाल प्राथमिक शिक्षा के बाद वे लाहौर चले गए। वहां से उन्होंने कला में स्नातक किया। चिपको आंदोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

अपनी पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से उन्होंने सिलयारा में ही पर्वतीय नवजीवन मंडल की स्थापना भी की। सन् 1949 में मीराबेन व ठाकुर बाप्पा के संपर्क में आने के बाद वे दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए तथा उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की। दलितों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया।

26 मार्च, 1974 को पेड़ों की कटाई रोकने के लिए चिपको आंदोलन शुरु हुआ। उस साल जब उत्तराखंड के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हज़ार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई तो गौरा देवी नामक महिला ने अन्य महिलाओं के साथ इस नीलामी का विरोध किया। इसके बाद भी सरकार और ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंच गए तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की।

जब उन्होंने पेड़ काटने की ज़िद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। अंततः ठेकेदार को जाना पड़ा। बाद में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने अपनी बात रखी। फलस्वरुप रैंणी गांव का जंगल नहीं काटा गया। इस प्रकार यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। 1971 में उन्होंने शराब की दुकानों के खुलने के विरोध में 17 दिन तक अनशन किया।

उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी। बाद के सालों में यह आंदोलन उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक, पश्चिम में राजस्थान, पूर्व में बिहार और मध्य भारत में विंध्य तक फैल गया।

इस आंदोलन का यह असर हुआ कि उत्तर प्रदेश में वनों की कटाई पर प्रतिबंध लगा साथ ही पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में भी सफल रहा। साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाव बनाने में भी सफल रहा।

इस आंदोलन की अगुआई सुंदरलाल बहुगुणा कर रहे थे जिसके कारण वह विश्व में विख्यात हो गए तथा उन्हें वृक्षमित्र के कारण जाना जानें लगा। बहुगुणा के इस सफल प्रयास से अमेरिका प्रभावित हुआ तथा उन्हें अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में उनको पुरस्कृत किया। अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के रुप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला।

1981 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया लेकिन उन्होंने यह पुरस्कार लेने से मना कर दिया यह कहकर कि ‘जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूं।’

1986 में रचनात्मक कार्य के लिए सन 1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार मिला, 1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1989 में आईआईटी रुड़की द्वारा सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि प्रदान की गयी। 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।


BY : Saheefah Khan