विशेष - शिबू सोरेन : आदिवासियों के लिए लड़ने वाले ‘जगत गुरु’ अपने गंवई अंदाज़ के कारण प्रसिद्ध

शिबू सोरेन : आदिवासियों के लिए लड़ने वाले ‘जगत गुरु’ अपने गंवई अंदाज़ के कारण प्रसिद्ध



Posted Date: 11 Jan 2019

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11 जनवरी,1944 को बिहार के हजारीबाग में जन्में शिबू सोरेन देश की राजनीति में ऊंचा मुकाम रखते हैं। वह सातवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, तेरहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा के सदस्य चुने गए। इसके अलावा वह झारखंड की तीसरे मुख्यमंत्री बने तथा तीन बार राज्य की कमान संभाल चुके हैं। राज्य की राजनीति से बाहर केन्द्र की राजनीति में भी उनका अहम योगदान रहा है। वह मनमोहन सिंह की सरकार में कोयला मंत्री भी बने।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 में हुई तथा 23 जनवरी, 1975 को उन्होंने तथाकथित रुप से जामताड़ा जिले के चिरुडीह गांव में बाहरी लोगों को खदेड़ने के लिए एक हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था। इस घटना में 11 लोग मारे गये थे। उन्हें 68 अन्य लोगों के साथ हत्या का अभियुक्त बनाया गया।

शिबू पहली बार 1977 में लोकसभा के लिए चुनाव में खड़े हुए लेकिन उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। उनका यह सपना 1986 में पूरा हुआ। इसके बाद क्रमशः 1986, 1989, 1991, 1996 में भी चुनाव जीते। 2002 में वह भाजपा की सहायता से राज्यसभा के लिये चुने गए। 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिए चुने गये और राज्यसभा की सीट से त्यागपत्र दे दिया।

सन् 2005 में झारखंड विधानसभा चुनावों के पश्चात वे विवादस्पद तरीके से झारखंड के मुख्यमंत्री बने परंतु बहुमत साबित न कर सकने के कारण कुछ दिन पश्चात ही इस्तीफा देना पड़ा।

2008 में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संथाल परिषद ने संथाली भाषा को प्रोस्तासहन देने तथा आदिवासियों की समस्याओं के निदान की दिशा में योगदान के लिए जगत गुरु की उपाधि से सम्मानित किया। वह नौकरी की तलाश में दिल्ली-मुंबई जाने वाले लोगों से कहते हैं कि वहां कुछ नहीं रखा है। यहीं रहो और काम करो। झारखंड में क्या नहीं है कभी सोचा है? खान-खदान, नदी, पहाड़, जंगल सब कुछ यहीं है। हम अपना हक और अधिकार के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। बाहर जाकर सब मुर्ख बनता है।


BY : Saheefah Khan