विशेष - शांता सिन्हा : शोषण की दुनिया से मासूमों को निकाल स्कूल पहुंचाने वाली ऐसी महिला जिन्हें मिला मैग्सेसे पुरस्कार

शांता सिन्हा : शोषण की दुनिया से मासूमों को निकाल स्कूल पहुंचाने वाली ऐसी महिला जिन्हें मिला मैग्सेसे पुरस्कार



Posted Date: 07 Jan 2019

39
View
         

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित विश्व पटल पर देश का नाम रौशन करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शांता सिन्हा का जन्म 2 जनवरी 1950 को हुआ था। आन्ध्र प्रदेश में बालश्रम के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली इस महिला ने लोगों को इस बात के लिए जागरुक किया कि गरीब परिवार के बच्चे जब स्कूल पहुंचते हैं तो उनके माता-पिता की गरीबी कुछ ही समय की मेहमान रह जाती है। उन्होंने लोगों की इस धारणा को तोड़ा कि गरीबों के बच्चों के काम किए बिना परिवार का गुज़ारा नहीं हो सकता।

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में जन्मी शांता ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से 1972 में एम.ए. की परीक्षा पास की तथा 1976 में उन्होंने जवाहरलाल यूनिवर्सिटी से डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की। शान्ता सिन्हा शुरु से ही बाल मजदूरी की स्थिति को देखकर बेचैन रही थीं और उनके मन में इसके लिए कुछ ठोस कार्य करने का विचार बार-बार आता था। 1987 में वह हैदराबाद यूनिवर्सिटी में थीं तभी यूनिवर्सिटी के विस्तार कार्यक्रम में प्रमुख के नाते उन्हें मौका मिला और उन्होंने तीन महीने चलने वाले एक कैंप का आयोजन किया, जिसमें बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी कराई गई। उनका यह अनुभव उत्साहजनक रहा।

अपने दादा के नाम पर 1991 मे उन्होंने ‘मामिडिपुडी वैंकटरगैया फाउन्डेशन’ नाम की एक संस्था स्थापित की। इस संस्था का लक्ष्य था कि पूरे आन्ध्र प्रदेश से बाल मजदूरी खत्म करके हर एक बच्चे को स्कूल भेजने की परंपरा डाली जाए। अपने इस काम की शुरुआत शान्ता ने रंगारेड्डी जिले के गरीबी से ग्रस्त गांवो से की। संस्था के लोग इस तलाश में थे कि वह बाल मजदूरी कर रहे बच्चों के परिवार से मिलकर उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करें।

गांव को गरीब लोगों को लगता था कि पढ़ाई, स्कूल, सब पैसे वाले परिवारों की बातें हैं, जब कि एमवीएफ की तरफ से संस्था के लोगों का कहना था कि पढ़-लिख कर ही गरीबी से छुटकारा पाया जा सकता है। यह स्थिति एमबीएफ तथा शान्ता के लिए कठिन थी, जिसे उन लोगों को हर हाल में जीतना था।

शान्ता सिनहा ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस काम के लिए ट्रांसिशन कैम्प लगाए। अपने साथ स्कूल के अध्यापकों तथा स्थानीय अधिकारियों को लिया, ताकि उनके समझाने का अधिक प्रभाव पड़े। शान्ता सिन्हा ने यह भी प्रबंध किया कि उनके साथ वे मालिक लोग भी आएं जिनके पास बच्चों ने कभी काम किया हो।

शान्ता तथा उनके सहयोगियों के अथक प्रयास से उन्हें स्थानीय तथा अंतर्राष्ट्रीय अनुदान मिलने लगा और 1997 तक उनके लिए पांच सौ गांवों मे एमवीएफ की गतिविधियां फैल गईं। धीरे-धीरे शान्ता सिन्हा के अस्थायी स्कूल जो बच्चों को शुरुआती दौर की तैयारी कराने के लिए खोले गए थे, इतने विकसित हो गए कि उनमें तैयार बच्चे सामान्य स्कूलों में लिए जा सकें। उन्हें बुनियादी तौर पर सामान्य स्कूलों जैसे ही गीत और कविताएं सिखाईं गईं।

शान्ता सिन्हा का ऐसा मानना था कि ये बच्चे तो बुनियादी स्कूलों से निकले हैं, उन्हें नियमित स्कूलों में जाना चाहिए, न कि ‘पार्ट टाइम स्कूलों’ में। पार्ट टाइम स्कूल, इस स्तर तक बच्चों में वह उत्साह नहीं संचारित करते, जितना उन्हें इस समय चाहिए। इसलिए शान्ता सिन्हा की कोशिश रही कि वह सामान्य स्कूलों के रूप में पब्लिक स्कूलों की मानसिकता में ऐसे बच्चों के लिए एक जगह स्वीकार करें और उन्हें बराबर समझकर, व्यवहार करें।

इसके लिए शान्ता सिन्हा की टीम, जिसमें बच्चों के माता-पिता, उनके शिक्षक, कुछ चुने हुए अधिकारीगण तथा वह स्वयं प्रयासरत रहीं कि ऐसे बच्चों के लिए अनुकूल स्कूलों की तलाश की जा सके, तथा उन्हें, इस अभियान में जोड़ा जा सके। इस क्रम में शान्ता सिन्हा वर्ष 2000 तक करीब ढाई लाख ऐसे बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाई, जो पहले कभी बाल-श्रमिक थे।

अपने इस अभियान में शान्ता सिन्हा का ध्यान केवल बाल-श्रमिकों पर नहीं था बल्कि उनकी सोच में प्रौढ़ शिक्षा का पूरा स्थान था। शान्ता सिन्हा भारत सरकार के इस तरह बहुत से आयोजनों से जुड़ी हुईं थीं। अस्सी के दशक के दौरान शान्ता हैदराबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल सांइस विभाग से जुड़ी हुई थीं और उनका ध्यान इस ओर पूरी तरह से केंद्रित था कि काम में लगे हुए वयस्क कामगारों को किस तरह से इस दिशा में एकजुट किया जाए।

अपनी जी-तोड़ और निस्वार्थ मेहनत के कारण शान्ता सिन्हा को 1999 में ‘एलर्ट शंकर इन्टरनेशनल अवार्ड’ अमेरिका द्वारा प्रदान किया गया। वर्ष 1999 में ही भारत सरकार ने पद्मश्री की उपाधि से नवाज़ा। 2003 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कोशिश अभी भी निरंतर जारी है।


BY : Saheefah Khan