राष्ट्रीय - लोकसभा में Right to Disconnect Bill... क्या मिलेगा ऑफिस टाइमिंग के बाद ऑफिशियल कॉल डिस्कनेक्ट करने का अधिकार?

लोकसभा में Right to Disconnect Bill... क्या मिलेगा ऑफिस टाइमिंग के बाद ऑफिशियल कॉल डिस्कनेक्ट करने का अधिकार?



Posted Date: 09 Jan 2019

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नई दिल्ली। जहां एक ओर केंद्र की मोदी सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम पड़ाव पर आम जन के लिए लोक लुभावन सौगातों की बाहर करने में जुटे हैं। वहीं एक सांसद ने लोकसभा में प्राइवेट बिल लाकर उस दर्द की ओर इशारा दिया जिसके बारे में शायद ही इससे पहले किसी ने गौर किया हो। बता दें सांसद ने इस बिल में कर्मचारियों को ऑफिस टाइमिंग के बाद ऑफिसियल कॉल डिस्कनेक्ट करने का अधिकार देने की बात कही है। इस बिल के माध्यम से उन्होंने इशारा दिया कि देश में कई ऐसी निजी संस्थान है, जहां काम के नाम पर लोगों पर आफिसियल टाइमिंग के बाद भी कॉल कर वर्क प्रेशर डाला जाता है।

उनका कहना है कि इस प्रकार की कार्यशैली से जुड़े कर्मचारियों को अपने कार्यक्षेत्र और सामजिक क्षेत्र में तालमेल बिठाने में काफी कठिनाई होती है। नतीजन इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे वे कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

खबरों के मुताबिक़ एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने ये प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है। इस बिल को Right to Disconnect Bill नाम दिया गया है।

सुले ने बिल पेश करते हुए लोकसभा में कहा कि राइट टु डिस्कनेक्ट बिल कंपनियों द्वारा कर्मचारियों पर लादी जाने वाली काम के बाद की अपेक्षाओं को नियंत्रित करेगा।

एनसीपी सांसद ने कहा कि ‘इसे कर्मचारियों में तनाव कम होगा और वो अपनी पेशेवर और निजी जिंदगी में संतुलन बैठा सकेंगे।’

सुप्रिया सुले ने एक समाचार पत्र के सवाल के जवाब में बताया कि विभिन्न स्टडी में पता चला है कि जो कर्मचारी ऑफिस के बाद भी कई घंटे काम करते हैं या ऑफिस के संपर्क में बने रहते हैं, तो ऐसे लोगों में नींद की कमी और तनाव जैसी बीमारियों होने का खतरा बढ़ जाता है।

बता दें बीते 28 दिसंबर को लोकसभा में पेश किए गए राइट टु डिसकनेक्ट बिल के अनुसार, एक कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, जिसमें आईटी, कम्यूनिकेशन और श्रम मंत्री को शामिल किया जाएगा।

कर्मचारियों पर काम के घंटों के दौरान पड़ने वाले डिजिटल टूल्स के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा और उस पर सालाना एक रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। साथ ही बिल में कहा गया है कि कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण, कर्मचारी और नियोक्ता के बीच की शर्तों के एक चार्टर की रुपरेखा तैयार करे।

बिल के अनुसार, जिन कंपनियों में 10 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं, वो अपने कर्मचारियों के साथ समय-समय पर विशिष्ठ शर्तों पर बात करें और फिर उन शर्तों को अपने चार्टर में शामिल करें।

कंपनियों को एक कर्मचारी कल्याण समिति का गठन करने का भी बिल में उल्लेख है। इस समिति में कंपनी के कार्यबल के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

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बिल के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी ड्यूटी के बाद नियोक्ता की कॉल्स का जवाब नहीं देता है तो नियोक्ता कर्मचारी के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकेगा। इसके साथ ही सरकार कर्मचारियों को काउंसलिंग, डिजिटल डिटॉक्स सेंटर्स भी मुहैय्या कराएगी, ताकि कर्मचारी डिजिटल माध्यमों से इतर अपने आस-पास के लोगों के साथ भी जुड़ सके।

बता दें कि इससे मिलता-जुलता एक बिल फ्रेंच सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने देश में लागू किया गया था। इसके बाद यह न्यूयॉर्क में लागू किया गया। फिलहाल जर्मनी में इसे लागू करने पर चर्चा चल रही है।

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BY : Ankit Rastogi