विशेष - आरक्षण कार्ड से मोदी सरकार को नहीं मिलेगी जीत! क्या फिर फेल होगा प्रधानमंत्री का मास्टरस्ट्रोक?

आरक्षण कार्ड से मोदी सरकार को नहीं मिलेगी जीत! क्या फिर फेल होगा प्रधानमंत्री का मास्टरस्ट्रोक?



Posted Date: 11 Jan 2019

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लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के आखिरी शीतकालीन सत्र में आर्थिक स्तर पर कमजोर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत वाला आरक्षण बिल लाकर पूरे देश को चौंकाया। सरकार के इस कदम को विपक्ष ने भले ही पॉलिटिकल स्टंट बताया। लेकिन ना चाहते हुए भी उसे बिल का समर्थन करना पड़ा। विपक्ष की इस मजबूरी को मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक करार दिया गया।

साथ ही मीडिया से लेकर सोशल प्लैटफॉर्म पर इसे आगामी लोकसभा चुनाव में जीत दिलाने वाला बिल करार दिया जा रहा है। लेकिन यहां पर गौर करने वाली बात है कि क्या सवर्णों को आर्थिक स्तर पर आरक्षण मुहैया कराने वाला बिल पीएम मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत का मास्टर स्ट्रोक साबित होगा या एक बार फिर इतिहास दोहराएगा और बीजेपी को आगामी चुनाव में झटका मिलेगा?

वीपी सिंह सरकार का OBC आरक्षण कार्ड हुआ था फेल!

दरअसल, उपर्युक्त सवाल इस लिए उठ रहा है, क्योंकि वर्ष 1990 में तत्कालानी प्रधानमंत्री वीपी सिंह सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। इसे आप मंडल आयोग के नाम से भी जानते हैं। तब भी इसे वीपी सिंह सरकार का मास्टरस्ट्रोक कहा गया था। हालांकि एक साल के भीतर ही वीपी सिंह सरकार सत्ता से हट गई।

अब वर्तमान समय में मोदी सरकार के आर्थिक आधार पर लाए गये 10 प्रतिशत वाले सवर्ण आरक्षण बिल को भी मीडिया से लेकर अन्य जगहों पर मास्टरस्ट्रोक का खिताब दिया जा रहा है। पर क्या धरातल पर यह सच साबित होगा?

सुप्रीम कोर्ट में सवर्ण आरक्षण बिल पास होना कितना संभव?

चूंकि यह बिल लोकसभा और राज्यसभा में पास हो गया है, इसलिए अगर यह बिल धरातल पर लागू होने के लिए आया भी तो इसे काफी मुश्किलों से गुजरना होगा। पहले तो इसे राष्ट्रपति और फिर कुल राज्यों में दो तिहाई बहुमत हासिल करना होगा। यह सब करने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में बिल पास होना चुनौती पूर्ण साबित होने वाला है। ऐसा इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि देश में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण किसी भी स्थिति में नहीं दिया जा सकता।

कानूनी जानकार भी कह चुके हैं कि भारत में पहले ही आरक्षण के नाम पर 49.5 फीसद कोटा आरक्षित है। ऐसे में 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण किसी भी परिस्थिति में तर्क संगत नहीं है। अब यहां पर गौर करने वाली बात ये है कि क्या बीजेपी ओबीसी और एससी/एसटी कोटे से सामान्य वर्ग को आरक्षण देगी जोकि संभव होता नहीं दिख रहा है, या फिर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण को गलत साबित करेगी। खैर, यह तो आने वाले समय ही बताएगा। लेकिन सवर्ण आरक्षिण बिल के अब तक के इतिहास को देखें तो यह बिल लागू होना मुश्किल होता दिख रहा है।

कब-कब रद्द हुआ सवर्ण आरक्षण बिल

1991 में मंडल कमीशन के बाद प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आर्थिक आधार पर 10 फीसद आरक्षण का फैसला किया था। साल 1992 में अदालत ने इस फैसले को निरस्त कर दिया था। वहीं बिहार में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने को बाद वर्ष 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पुरी ठाकुर ने भी सवर्णों को 03 फीसदी आरक्षण दिया था। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने इस फैसले को निरस्त कर दिया था।

साल 2015 में राजस्थान सरकार ने भी आर्थिक आधार पर कमजोर सवर्ण जाति के लोगों को सरकारी नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में 14 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। सरकार ने कहा था कि 6 लाख से कम आय वाले लोग इस आरक्षित कैटेगरी का लाभ ले लकेंगे। हालांकि साल 2016 में राजस्थान हाई कोर्ट ने इस बिल को असंवैधानिक करारा देते हुए इसे रद्द कर दिया था।

बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद सवर्ण आरक्षण बिल

अब यहां इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि बीजेपी के लिए सवर्ण आरक्षण बिल क्या वाकई लाभकारी साबित होने वाला है। दरअसल, अब तक के चुनावी दौर को देखें तो यह माना जाता है कि अधिकतर सामान्य वर्ग का व्यक्ति बीजेपी का पारंपरिक वोटर रहा है। ऐसे में इस बिल के आने से बीजेपी को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के इन पारंपरिक वोटरों में रोष देखे को मिला था। लेकिन इस बिल से बीजेपी को बुहत अधिक लाभ नहीं होने वाला है।

वहीं दूसरी ओर, क्योंकि देश में सवर्णों की आबाद कम है इसलिए भी मोदी सरकार को इस बिल से लोकसभा चुनाव में जीत की उम्मीद कम होगी। इसके अलावा दक्षिण-पूर्वी राज्यों में सामान्य श्रेणी के लोगों की जनसंख्या और भी कम है। ऐसे में पार्टी के लिए यहां पर इस बिल का बहुत कम ही लाभ मिलेगा। और कानूनी तौर पर बिल पास होने में लंबा वक्त है। यानी इससे पहले ही लोकसभा चुनाव शुरु हो जाएंगे। इऩ सभी परिस्थितियों में आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए सवर्ण आरक्षण बिल मास्टरस्ट्रोक साबित होना संभव होता नहीं दिख रहा है।

देश में सवर्णों को आबादी?

देश में सामान्य वर्ग की आबादी, पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति के अपेक्षाकृत कम है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में सवर्ण आबादी कितनी है इसका आधिकारिक आंकड़ा स्पष्ट नहीं है, लेकिन सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवेलपिंग  सोसाइटी (सीएसडीएस) सर्वे के अनुसार, देश के विभिन्न प्रांतों में सवर्ण जातियों के लोगों की आबादी 20 से 30 प्रतिशत के मध्य है। अगर हिन्दी भाषी राज्यों में निवास करने वाली सवर्ण आबादी पर नज़र डाले तो सीएसडीएस की सर्वे रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में 50 प्रतिशत और हरियाणा में 40 प्रतिशत सवर्णों की आबादी है। वहीं उत्तर प्रदेश में 25 प्रतिशत, राजस्थान में 23 प्रतिशत, झारखंड में 20 प्रतिशत, बिहार में 18 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 12 प्रतिशत आबादी सामान्य वर्ग की है।

इसके अलावा गैर हिन्दी भाषी राज्य में सवर्ण आबादी- पंजाब में 48 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 48 प्रतिशत, असम में 35 प्रतिशत, गुजरात में 30 प्रतिशत, केरल में 30 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 30 प्रतिशत, ओड़िसा में 20 प्रतिशत, कर्नाटक में 19 प्रतिशत और तमिलनाडु में 10 प्रतिशत सवर्ण आबादी है। इन राज्यों के अलावा अन्य प्रदेशों में समान्य वर्ग की जनसंख्या बहुंत कम है।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बीजेपी सरकार के लिए सवर्ण आरक्षण बिल लोकसभा चुवान में उतना असरकारी साबित नहीं होगा। जितना की मीडिया से लेकर सोशल मीडिया ने देशभर में हल्ला मचाया हुआ है।


BY : shashank pandey