राजनीति - अपने ही दावों पर फेल मोदी सरकार! आपाधापी में उठाये गए हालिया कदम दिखा रहे हकीकत का आईना

अपने ही दावों पर फेल मोदी सरकार! आपाधापी में उठाये गए हालिया कदम दिखा रहे हकीकत का आईना



Posted Date: 09 Jan 2019

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नई दिल्ली। आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र सत्ता पक्ष यानी भाजपा और मजबूत विपक्ष के तौर पर खड़ी कांग्रेस में भले ही हर दिन तू तू-मैं मैं की स्थिती बनी हुई है। लेकिन लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप मढ़ने वाली भाजपा, आज उन्ही पायदानों पर चढ़ने की कोशिश में जुटी है।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो आज आम चुनावों में अपनी बिखरती साख (जिसका अंदाजा हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनावों में हुआ) को बचाने की कोशिश इस अंजाम पर आकर पहुंच गई कि भाजपा उन्हीं कूटनीतियों पर कदम बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही है, जिसका वह हमेशा से विरोध करती आई है।

केंद्र द्वारा उठाये गए हालिया क़दमों पर गौर करें तो साफ दिखाई देता है कि विशेष वर्ग, धर्म और समुदाय पर केंद्रित राजनीति का श्रेय मौजूदा समय में मोदी सरकार को जाता। चाहे बात की जाए तीन तलाक की या दलित और सवर्ण समुदाय को खुश करने के लिए प्रयोग में लाये जा रहे तरह-तरह के उपायों की। आपाधापी में कुछ के लिए अध्यादेश तो कुछ के लिए विधेयकों का सहारा लिया जा रहा है।

पौने पांच साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने भी कांग्रेस की तर्ज पर समाज के एक खास वर्ग को तुष्ट करने की कोशिशें की हैं। ये अलग बात है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस बात का दावा करते रहे हैं कि उनकी पार्टी पॉलिटिक्स ऑफ परफॉर्मेन्स करती है और उसी के आधार पर चुनावी जीत हासिल करती है।

बता दें शाह के अलावा पूर्व भाजपा अध्यक्षों और पार्टी के बड़े नेताओं का भी यही दावा रहा है, मगर मोदी सरकार के हालिया फैसलों पर नजर डालें तो मुस्लिम महिलाओं से लेकर दलित और सवर्ण समुदाय को खुश करने के लिए भाजपा ने अलग-अलग तरह के उपाय किए हैं।

सवर्णों को आरक्षण

मोदी सरकार के इन फैसलों में सबसे ज्यादा चर्चित 124वां संविधान संशोधन बिल है, जिसके जरिए गरीब सवर्णों को शिक्षा और नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों में भाजपा की सरकार गिरने के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2019 के चुनावों में हार की आशंका और सवर्ण समाज की नाराजगी दूर करने के लिए यह कदम उठाया है।

खबरों के मुताबिक इन राज्यों के विधान सभा चुनाव में सवर्ण मतदाताओं ने बड़ी संख्या में या तो नोटा का बटन दबाया था या फिर कांग्रेस की तरफ रुख कर लिया था। इनके अलावा बिहार, यूपी समेत कमोबेश सभी हिन्दी पट्टी राज्यों में अगड़ी जाति के लोग केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से एससी-एसटी एक्ट में संशोधन की वजह से नाराज चल रहे थे।

तीन तलाक पर अध्यादेश और बिल

मुस्लिम महिलाओं को एक झटके में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की कुप्रथा से आजादी दिलाने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद में दो बार मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण) कानून पेश किया लेकिन यह राज्यसभा से पारित नहीं हो सका। पहली बार बिल मानसून सत्र में पेश किया गया था लेकिन संसद से पारित नहीं होने पर सरकार ने इस पर सितंबर 2018 में अध्यादेश लाया था। दूसरी बार जब फिर से कुछ संशोधनों के साथ शीतकालीन सत्र में तीन तलाक पर बिल संसद में पेश किया गया तो यह राज्यसभा में अटक गया। माना जाता है कि मोदी सरकार ने मुस्लिम महिला तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए तीन तलाक को अपना अहम एजेंडा बनाया है। हालांकि, अध्यादेश अभी भी प्रभावी है लेकिन उसकी वैधता लागू होने से छह महीने (मार्च) तक ही है।

एससी/एसटी एक्ट पर अध्यादेश फिर संशोधन बिल

पिछले साल (2018) 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के गोयल और जस्टिय यूयू ललित की खंडपीठ ने एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) एक्ट पर बड़ा फैसला सुनाया था कि किसी भी आरोपी को दलित अत्याचार के केस में प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। इससे पहले केस दर्ज होने के बाद ही गिरफ्तारी का प्रावधान था। इस फैसले से देशभर के दलितों ने 2 अप्रैल को देशव्यापी बंद का आह्वान किया था।

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मोदी सरकार में शामिल कई दलित मंत्रियों और एनडीए के दलित सांसदों ने भी इस फैसले पर रोष जताया था। इसके दबाव में मोदी सरकार ने पहले एससी-एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाया और बाद में संसद के मानसून सत्र में एससी-एसटी कानून में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कानून के पुराने प्रावधानों को बहाल कर दिया। इससे दलित समुदाय तो खुश हो गया लेकिन सवर्ण समाज नाराज हो उठा और कई केंद्रीय मंत्रियों को सवर्ण समाज के लोगों ने कई मौकों पर घेरा।

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BY : Ankit Rastogi