राजनीति - सवर्णों के आरक्षण को मायावती ने बताया राजनीतिक चाल, बीजेपी से किया सवाल, पहले क्यों नहीं लिया फैसला?

सवर्णों के आरक्षण को मायावती ने बताया राजनीतिक चाल, बीजेपी से किया सवाल, पहले क्यों नहीं लिया फैसला?



Posted Date: 08 Jan 2019

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नई दिल्ली। बीते दिन बीजेपी द्वारा आर्थिक आधार पर सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की गई। बीजेपी द्वारा की गई इस घोषणा के बाद से सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। मामले को लेकर कई राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। मोदी द्वारा लिए गए इस फैसले पर विपक्ष इसका सपोर्ट करे या फिर विरोध, इसे लेकर विपक्षी दलों के बीच गहमागहमी का माहौल बना हुआ है।

ऐसे में सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि यह फैसला बीजेपी की राजनीतिक चाल ही लगती है। उन्होंने इस फैसले पर सरकार से सवाल पूछते हुए कहा कि सरकार ने सवर्णों को आरक्षण देने का यह फैसला पहले क्यों नहीं लिया। हालांकि उन्होंने कहा कि हम सरकार के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के आरक्षण देने के कदम का स्वागत करते हैं। हम इस बिल का संसद में समर्थन करेंगे।

उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले लिया गया यह फैसला हमें सही नीयत से लिया गया फैसला नहीं लगता है। यह एक चुनावी स्टंट है, राजनीतिक छलावा लगता है। अच्छा होता अगर बीजेपी अपना कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले नहीं बल्कि इसे और पहले ले लेती।

मायावती के अलावा इस मसले पर अपनी पार्टी का समर्थन व्यक्त करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार से कहा कि वह संसद सत्र का विस्तार करे और इसे तत्काल कानून बनाने के लिए संविधान में संशोधन करे, वरना यह महज चुनावी स्टंट साबित होगा।

सरकार के इस विधेयक को लेकर अगर विपक्ष के रुख की बात करें तो फिलहाल तो कई विपक्षी पार्टियों ने सरकार के इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के द्वारा भी इस मसले पर सरकार से सहमति बनती दिख रही है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इस मसले पर कहा कि आर्थिक तौर पर गरीब व्यक्ति के बेटे या बेटी को शिक्षा एवं रोजगार में अपना हिस्सा मिलना चाहिए। हम इसके लिए हर कदम का समर्थन करेंगे।

सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब लोकसभा चुनाव में 100 दिन से भी कम समय शेष है। ऐसे में सरकार के इस फैसले को सवर्णों को लुभाने के तौर पर भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि हाल ही में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हारने के बाद सरकार अपने इस फैसले से सवर्णों का वोटबैंक वापस अपनी तरफ खीच रही है। इन तीन राज्यों में हुए चुनावों में एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी संख्या में सवर्णों ने नोटा का विकल्प चुना था।

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ऐसे में बीजेपी ने इस वर्ग की नाराजगी को समझते हुए लोकसभा चुनावों से पहले यह कदम उठाया है। बीजेपी के इस कदम से विपक्षी पार्टियां भी असमंजस की स्थिति में हैं कि वह इसका विरोध कर कहीं सवर्णों की नाराजगी का शिकार न हो जाएं।

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BY : Indresh yadav