विशेष - लोचन प्रसाद पांडेय : हिंदी के मशहूर साहित्यकार, बड़े अदब से आज भी लिया जाता है नाम

लोचन प्रसाद पांडेय : हिंदी के मशहूर साहित्यकार, बड़े अदब से आज भी लिया जाता है नाम



Posted Date: 08 Nov 2018

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लोचन प्रसाद पांडेय प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार थे। इन्होंने हिंदी एवं उड़िया, दोनों भाषाओं में काव्य रचनाएं भी की हैं। सन 1905 से ही इनकी कविताएं ‘सरस्वती’ तथा अन्य मासिक पत्रिकाओं में निकलने लगी थीं। इनकी कुछ रचनाएं कथाप्रबंध के रूप में हैं तथा कुछ फुटकर। वे ‘भारतेंदु साहित्य समिति के भी सदस्य थे। मध्य प्रदेश के साहित्यकारों में इनकी विशेष प्रतिष्ठा थी। आज भी इनका नाम बड़े आदर से लिया जाता है।

बता दें इनका जन्म 4 जनवरी 1887 को मध्य प्रदेश के बिलासपुर जिले में बालपुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता पंडित चिंतामणि पांडेय विद्याव्यसनी थे। उन्होंने अपने गांव में बालकों की शिक्षा के लिए एक पाठशालय खुलवाई थी।

इनकी प्रारंभिक शिक्षा बालपुर निजी पाठशाला में हुई। सन 1902 में मेडिकल संबलपुर के पास किया और 1905 में कोलकाता से इंटर की परीक्षा पास करके बनारस गये, जहां अनेक साहित्य मनीषियों से उनका संपर्क हुआ।

उन्होंने अपने प्रयत्न से ही उड़िया, बंगला और संस्कृत का भी ज्ञान प्राप्त किया था। इन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक जगहों का भ्रमण किया।

सन 1932 में उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली’ की स्थापना की, जो बाद में ‘महाकौशल इतिहास परिषद’ कहलाया। उनका साहित्य, इतिहास और पुरातत्व में समान अधिकार था।

लोचन प्रसाद पाण्डेय स्वभाव से सरल एवं निश्छल थे। इनका व्यवहार आत्मीयतापूर्ण हुआ करता था। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों को चरित्रोत्थान की प्रेरणा दी। उस समय उपदेशक का कार्य भी साहित्य के सहारे करना आज की तरह नहीं था, इसलिए इनकी रचनाओं ने पाठकों के संयम के प्रति रुचि उत्पन्न की। ये 'भारतेन्दु साहित्य समिति' के एक सम्मानित सदस्य थे। मध्य प्रदेश में इनके प्रति बड़ा आदर, सम्मान एवं प्रतिष्ठा का भाव है।

लोचन प्रसाद पाण्डेय का साहित्यिक-कृतित्व, चरित्रोत्थान, नीति-पोषण, उपदेश-दान, वास्तविक-चित्रण एवं लोककल्याण के लिए ही परिसृष्ट हुआ है। इनके काव्य का वस्तुगत रूपाधार अभिधामूलक, निश्चित एवं असांकेतिक है। ये कथा एवं घटना का आधार लेकर वृत्तात्मक कविताएँ लिखा करते थे। सन 1905 ई. से ये 'सरस्वती' में कविताएँ लिखने लगे थे।

भारतेन्दु का जागरण-तृयं बज चुका था। द्विवेदी युग के शक्ति-संचय काल में लोचन प्रसाद पाण्डेय का अभ्यागमन हुआ। इसी समय सहृदय सामयिकता, ओज, संतुलित पद-योजना एवं तत्सम पदावली से पूर्ण इनकी कविता ने सांकेतिकता एवं ध्यन्यात्मकता के अभाव में भी हृदय-सम्पृक्त इतिवृत्त के कारण लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। स्फुट एवं प्रबन्ध, दोनों ही प्रकार की कविताओं द्वारा लोचन प्रसाद जी ने सुधार-भाव को प्रतिष्ठापित किया।

'मृगी दु:खमोचन' नामक कविता में वृक्ष-पशु आदि के प्रति भी इनकी सहृदयता सुन्दर रूप में व्यक्त हुई है। ये मध्य प्रदेश के अग्रगण्य साहित्य नेता भी रहे। इनका निधन 8 नवंबर 1959 को हुआ। 

लोचन प्रसाद पाण्डेय की प्रमुख रचनाओं का विवरण इस प्रकार है-

'दो मित्र' उद्देश्य प्रधान, सामाजिक उपन्यास, मैत्री आदर्श, समाज-सुधार, स्त्री-चरित्र से प्रेरित एवं पाश्चात्य सभ्यता की प्रतिक्रिया पर लिखित लोचन प्रसाद पाण्डेय की 1906 में प्रकाशित प्रथम कृति है।

1907 में मध्य प्रदेश से ही प्रकाशित 'प्रवासी' नामक काव्य-संग्रह में छायावादी, रहस्यमयी संकलनों की भाँति कल्पनागत, मूर्तिमत्ता एवं ईषत् लाक्षणिकता का प्रयास दिखाई पड़ता है।

1910 में 'इण्डियन प्रेस', प्रयाग से 'कविता कुसुम माला', बालोपयोगी काव्य-संकलन एवं 1914 में 'नीति कविता' धर्मविषयक संग्रह निकले।

लोचन प्रसाद पाण्डेय का 1914 में 'साहित्यसेवा' नामक प्रहसन प्रकाशित हुआ, जिसमें व्यग्य-विनोद के लिए हास्योत्पादन की अतिनाटकीय घटना-चरित्र-संयोजन शैली का प्रयोग हुआ है।

सन 1914 में समाज-सुधारमूलक 'प्रेम प्रशंसा' व 'गृहस्थ-दशा दर्पण' नाट्य-कृति प्रकाशित हुई थी।

उनका 'मेवाड़ गाथा' ऐतिहासिक खण्ड-काव्य सन 1914 में ही प्रकाशित हुआ था।

सन 1915 में 'पद्य पुष्पांजलि' नामक दो काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हुए थे।

1915 में ही उनके सामाजिक एवं राष्ट्रीय नाटक 'छात्र दुर्दशा' एवं अतिनाटकीयतायुक्त व्यंग्य-विनोदपरक 'ग्राम्य विवाह' आदि नाटक निकले।


BY : Abdul Mannan


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