विशेष - आरोप-प्रत्यारोप के खेल में विलुप्त होती ‘आलोचना’

आरोप-प्रत्यारोप के खेल में विलुप्त होती ‘आलोचना’



Posted Date: 08 Jan 2019

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लखनऊ। अमित शाह का बयान ‘संपत्ति हड़पने वाले प्रधानमंत्री की आलोचना ना करें’ की हेडलाइन के साथ कल का अख़बार जलवा अफरोज़ हुआ, नीचे अमित शाह की फायरलुक वाली तस्वीर। निश्चित ही यह संकेत कांग्रेस अध्यक्ष की ओर ईंगित थे। हेडलाइन पर नज़र जाते ही ज़हन में यह सवाल उमड़ पड़ा कि यदि आलोचना के लिए बेदाग चरित्र का  मानक रखा जाये तो क्या इस दायरे में स्वंय अमित शाह खरे उतरेंगें ?

यह कोई नई खबर नहीं थी, हम भारतीयों की यह तकदीर बन चुकी है कि चाहे सुबह न्यूजपेपर उठा ले या शाम को पीठ को आराम देने के लिए थोड़ा सा टेक लगाकर टीवी खोल लें एक ना एक आरोप प्रत्यारोप की खबर तो पढ़ने को मिल ही जाती है। 

अमित शाह ने जो कुछ कहा वह नेशनल हेराल्ड के संबंध में था। नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करने वाली कंपनी को सुप्रीम कोर्ट से नोटिस मिला है कि उसे दिल्ली में एक परिसर को खाली करना है, इस पर अमित शाह ने कांग्रेस पर सरकारी संपत्ति को हड़पने का आरोप लगाया है। यहां तक तो उनकी बात दुरुस्त लगी लेकिन जैसे ही उन्होंने प्रधान मंत्री की आलोचना न करने की चेतावनी दी वह कई गंभीर सवाल खड़े करती है। 

एक इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी बराबर हो सकते हैं लेकिन पीएम मोदी और राहुल गांधी बराबर हो जाएं यह कैसे संभव है?  देश की जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जिसे अपना प्रधानमंत्री चुना हो उसके ऊपर अगर एक विपक्ष दल का नेता उंगली उठाए और उसको यह जवाब दिया जाए कि तुम स्वयं को देखो क्या ऐसा लोकतंत्र को शोभा देता है? 

राहुल गांधी के सवाल कितने गंभीर होते हैं हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते।  राहुल गांधी और अमित शाह के अलावा भी देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का सीज़न चलता ही रहता है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पर अपने बेटों को बढ़ावा देने वाला बयान दिया था जिस पर नायडू ने पलटवार करते हुए कहा था कि ‘पीएम’ हताशा के कारण उन्हें निशाना बना रहे हैं। 

इसी प्रकार कोई किसी पर आरोप लगाता है तो उस आरोप का जवाब नहीं दिया जाता बल्कि उल्टा उसी पर दूसरा आरोप लगा दिया जाता है। एक प्रकार से देश में मुद्दों पर आधारित राजनीति न होकर सवाल पे सवाल की राजनीति चलती है।  

जब स्वतंत्र हुए देश में लोकतंत्र की बुनियाद डाली जा रही थी तो उसकी नींव में संपूर्ण जनता को रखा गया था। केंद्र बिंदु में आम जनता की समस्याएं रखी गयी थीं। विपक्ष नामी प्राणी भी इसीलिए वजूद में आया ताकि लोकतंत्र का प्रभावशाली अस्तित्व बरकरार रखा जा सके। जिसे आरोप-प्रत्यारोप की इस राजनीति ने समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

अब मुद्दा यह है कि लोकतंत्र का अस्तित्व किस तरह बरकरार रह सकता है?  जब सत्ता पक्ष सवालों का जवाब देने के बजाय लोगो को चुप कराने का रास्ता ढूंढने लगे तो लोकतंत्र कैसे जीवित रहेगा?  किसी भी लोकतांत्रिक सत्ता की रीढ़ उसकी आलोचना ही होती है, आलोचना के बल पर ही राष्ट्र विकास के पथ पर अग्रसर होता है लेकिन जब रीढ़ की हड्डी ही शरीर से निकाल दी जाए तो क्या आप सही सलामत चलने के काबिल रह पायेंगे?


BY : Saheefah Khan