विशेष - डाकिया डाक लाया..!

डाकिया डाक लाया..!



Posted Date: 10 Jan 2019

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डाकिया डाक लाया खुशी का पयाम कहीं दर्दनाक लाया...। ये गीत सुनते ही मन में एक ऐसे इंसान की छवि अंकित हो जाती जो कि खाकी वस्त्र और सर पर टोपी धारण किए हुए साइकिल पर सवार चला आ रहा हों, ये गीत सुनते ही बचपन की पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं।

इस गीत को सुनने के बाद बचपन का एक खूबसूरत वाकया याद या रहा हैं। तकरीबन 12 या 13 वर्ष की उम्र रही होगी। रोज की तरह स्कूल से छुट्टी के बाद दोस्तों के साथ ठहाके लगते घर की तरफ बढ़ रहा था। तभी घर के सामने जमा भीड़ को देखा। चेहरे पर चकित भाव धारण किए मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया। क्या हो रहा है..? ये जाने की लालसा में मैं भीड़ के केंद्र में जा पहुंचा। वहा मैंने देखा कि डाकिया सबको चिट्ठी बांट रहा था। भीड़ में मौजूद सभी लोग डाकिए से अपनी-अपनी चिट्ठी की खबर ले रहें थे, उन्ही भीड़ में मेरे पापा भी खड़े थे। उनके हाथ में मेरे चाचा जी की चिट्ठी थी, चाचा जी फ़ौज में थे जो कि उस वक़्त पठानकोट में कार्यरत थे।

उस चिट्ठी को बाद में पापा ने घर में सबके सामने पढ़कर सुनाया। तब पहली बार मैंने चिट्ठियों के प्रति लोगों में उत्सुकता को महसूस किया था। उस समय यह चलन में था कि फैमिली के सारे मेंबर एक जगह पर एकत्रित हो जाते थे और उन्ही में से कोई एक उस चिट्ठी को पढ़कर सुनाता था। फिर उस चिट्ठी की संभाल कर रख दिया जाता था। समय समय पर उन चिट्ठियों पर पड़ी धूल को साफ़ कर कभी-कभी उन चिट्ठियों को लोग फिर से पढ़ते थे।

गुज़रे जमाने में डाकघर और डाकिए की महत्वता अधिक होती थी। उस समय प्रेमी न सिर्फ अपनी प्रेमिका को खत लिखता था, बल्कि प्रेमिका खत के माध्यम से प्रेमी को फूल भेजा करती थी और लिखती थी..'फूल तुम्हे भेजा हैं खत में, फूल नहीं मेरा दिल है... प्रियतम मेरे लिखना क्या ये तुम्हारे काबिल हैं। उधर से प्रेमी जवाब में लिखता...'प्यार छुपा हैं इस खत में इतना, जितना सागर में मोती..। कुछ इस तरह के भाव निकल कर सामने आते थे।

इन्ही चिट्ठियों के माध्यम से कोई अपने वतन की मिट्टी को याद करता था तो कोई बेटा अपनी मां की चिट्ठी पढ़कर अनायास अपनी पलके भिगो लेता था। उन्ही चिट्ठियों के सहारे पत्नियां परदेश में रहने वाले पति का इंतजार करती थी, और जाते वक्त ये कहना कभी नहीं भूलती थी.. जाते हो परदेस पिया जाते ही खत लिखना...।

चिट्ठियों के द्वारा एक अलग ही जुड़ाव महसूस होता था। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ ही चीजे भी बदलती गई। आज समाज में मोबाइल, एसएमएस, ईमेल के बीच डाक और डाकिया दोनों गायब से हो गए हैं। वहीं समाज में उनकी भूमिका नाम मात्र की रह गई हैं। जिसे हर घर का दुख-दर्द मालूम रहता था, जिसके आने से खुशियों की लहर दौड़ जाती थी आज उनको लेकर खास उत्साह नजर नहीं आता। अब न तो हम किसी अपने से पहले जैसा अटैचमेंट महसूस कर पाते हैं और न ही उनके आने जाने को खबर रहती है।

क्या अब ऐसा नहीं लगता कि जिंदगी बहुत तेज़ दौड़ लगा रही है, लेकिन कुछ चीज़ें हमसे कोसों दूर चली जा रही है। बचपन में किताबों कहानियों में पत्र-मित्र के बारे में काफी पढ़ा सुना था। सोचा था आगे जाकर हम भी कभी पत्र-मित्रता करेंगे। पर जब पत्र-मित्र बनाने का मौका मिला तब तक पत्र-मित चैट-फ्रेंड में बादल चुके थे। सूचना क्रांति के इस दौर में आज भी हम लोगों से कम्यूनिकेट तो करते हैं। रोज़ हेल्लो, हाय .. होता है, लेकिन जो फीलिंग और इमोशनल अटैचमेंट खतों से महसूस होता था वो नए माध्यमो से कतई नहीं होता।

इस युवा वर्ग की पीढ़ी से यही उम्मीद करता हूं कि एक बार आप भी प्यार के कागज़ पर दिल की कलम से अपने चाहने वालों के लिए प्यार भरा पैगाम जरूर लिखे जिसके हर पन्ने पर खुशियों की झलक दिखाई दें और डाक और डाकिए की संस्कृति को जीवित बचाए रखा जाए क्योंकि आने वाला पल जाने वाला हैं..।


BY : ANKIT SINGH