विशेष - चित्तरंजन दास : स्वतंत्रता के ऐसे सेनानी जो कहलाए देशबंधु, जानिए पूरा जीवन चक्र

चित्तरंजन दास : स्वतंत्रता के ऐसे सेनानी जो कहलाए देशबंधु, जानिए पूरा जीवन चक्र



Posted Date: 05 Nov 2018

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चित्तरंजन दास भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थे, ये प्रसिद्ध भारतीय राजनेता वकील, कवि तथा पत्रकार थे। जिनका जीवन ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन’ में युगांतकारी था। इनको प्यार से ‘देशबंधु’ (देश के मित्र) कहा जाता था। ये महान राष्ट्रवादी तथा प्रसिद्ध विधि-शास्त्री थे।

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उन्होंने ‘अलीपुर षडयंत्र कांड’ (1908) के अभियुक्त अरविंद घोष का बचाव किया था। कई बार राष्ट्रवादियों और देशभक्तों की तरह इन्होंने भी ‘असहयोग आंदोलन’ के अवसर पर अपनी वकालत छोड़ दी और अपनी सारी संपत्ति मेडिकल कालेज तथा स्त्रियों के अस्पताल को दे डाली।

कांग्रेस पार्टी में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वो पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। ये ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापक थे। इन्होंने 1923 में लाहौर तथा 1924 में अहमदाबाद में ‘अखिल भारतीय हेड यूनियन कांग्रेस’ की अध्यक्षता भी की थी।

बता दें इनका जन्म 05 नवंबर, 1870 को कोलकाता में हुआ था और वह तत्कालीन ढाका जिले में तेलीरबाग के एक उच्च मध्यवर्गीय वैद्य परिवार से थे। उनके पिता भुबन मोहनदास कोलकाता उच्च न्यायालय में एक जाने माने वकील थे, शायद यही बात थी कि उन्होंने अपने पिता की कड़ी को थामे रखा और वे भी कलकत्ता उच्च न्यायालय के मशहूर वकील बन गए।

राजनीति में प्रवेश

चित्तरंजन दास ने अपनी चलती हुई वकालत छोड़कर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और पूर्णतया राजनीति में आ गए। उन्होंने विलासी जीवन व्यतीत करना छोड़ दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सिद्धान्तों का प्रचार करते हुए सारे देश का भ्रमण किया।

उन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति और विशाल प्रासाद राष्ट्रीय हित में समर्पण कर दिया। वे कलकत्ता के नगर प्रमुख निर्वाचित हुए। उनके साथ सुभाषचन्द्र बोस कलकत्ता निगम के मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त हुए। इस प्रकार श्री दास ने कलकत्ता निगम को यूरोपीय नियंत्रण से मुक्त किया और निगम साधनों को कलकत्ता के भारतीय नागरिकों के हित के लिए उन्हें नौकरियों में अधिक जगह देकर हिन्दू-मुस्लिम मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया। 

चित्तरंजन दास सन् 1922 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त हुए, लेकिन उन्होंने भारतीय शासन विधान के अंतर्गत संवर्द्धित धारासभाओं से अलग रहना ही उचित समझा। इसीलिए उन्होंने मोतीलाल नेहरू और एन. सी. केलकर के सहयोग से 'स्वराज्य पार्टी' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था कि धारासभाओं में प्रवेश किया जाए और आयरलैण्ड के देशभक्त श्री पार्नेल की कार्यनीति अपनाते हुए 1919 ई. के भारतीय शासन विधान में सुधार करने अथवा उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया जाए। यह एक प्रकार से सहयोग की नीति थी। स्वराज्य पार्टी ने शीघ्र ही धारासभाओं में बहुत सी सीटों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इनका निधन 16 जून 1925 को हुआ। 

अपने मृत्यु से कुछ समय पहले देशबंधु ने अपना घर और उसके साथ की जमीन को महिलाओं के उत्थान के लिए राष्ट्र के नाम कर दिया। अब इस प्रांगण में चित्तरंजन राष्ट्रिय कैंसर संस्थान स्थित है। दार्जिलिंग स्थित उनका निवास अब एक मात्री-शिशु संरक्षण केंद्र के रूप में राज्य सरकार द्वारा संचालित किया जाता है।

दक्षिण दिल्ली स्थित ‘चित्तरंजन पार्क’ क्षेत्र में बहुत सारे बंगालियों का निवास है जो बंटवारे के बाद भारत आये थे।उनके नाम पर देश के विभिन्न स्थानों पर अनेक संस्थानों का नाम रखा गया। इनमे प्रमुख हैं चित्तरंजन अवेन्यू, चित्तरंजन कॉलेज, चित्तरंजन हाई स्कूल, चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट, चित्तरंजन पार्क, देशबंधु कॉलेज फॉर गर्ल्स और देशबंधु महाविद्यालय।


BY : Abdul Mannan


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