विशेष - चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम : आज के दिन जन्में ये शख्स, जानिए इनके बारे में

चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम : आज के दिन जन्में ये शख्स, जानिए इनके बारे में



Posted Date: 07 Nov 2018

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चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम भारत में ‘हरित क्रांति के पिता’ कहे जाते हैं, जब भारत को आजादी प्राप्त हुई, उस समय देश में खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति बड़ी शोचनीय थी। कई स्थानों पर अकाल पड़े। बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अनेक लोग भुखमरी के शिकार हुए और काल का ग्रास बन गए। जब सी. सुब्रह्मण्यम को केंद्र में कृषि मंत्री बनाया गया, तब उन्होंने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक योजनाएं क्रियान्वित कीं। उनकी बेहतर कृषि नीतियों के कारण ही 1972 में देश के रिकाॅर्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ। सी. सुब्रह्मण्यम की नीतियों और कुशल प्रयासों से ही आज देश खाद्यान्न उत्पादन में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो चुका है।

बता दें इनका जन्म 30 जनवरी, 1910 को कोयम्बटूर जिले के ‘पोलाची’ नामक स्थान पर हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद मद्रास में उनकी उच्च शिक्षा हुई।

उन्होंने प्रेसीडेंसी काॅलेज, मद्रास से बी.एस.सी की डिग्री प्राप्त की और बाद में मद्रास विश्वविद्यालय से 1932 में क़ानून कि डिग्री प्राप्त की, परंतु 1936 तक वे वकालत प्रारम्भ नहीं कर सके। जब उन्होंने वकालत प्रारंभ की, तब तक उनका सम्बन्ध स्वतंत्रता आंदोलन से हो चुका था।

देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए की जा रही उनकी गतिविधियों के कारण ही वे गिरफ्तार भी हो चुके थे। इस प्रकार उनकी रुचि स्वतंत्रता आंदोलन की तरफ़ बढ़ती गई और अब वह पूरी तरह आज़ादी के सिपाही बन गये।

1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन' एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पड़ाव था, जब सम्भवत: कांग्रेस का कोई भी महत्त्वपूर्ण नेता जेल से बाहर नहीं रहा। सी. सुब्रह्मण्यम भी गिरफ्तारी से न बच सके। इस प्रकार कोयम्बटूर ज़िले में महत्त्वपूर्ण कांग्रेस नेता के रूप में इनका प्रभाव बढ़ता गया। कोयम्बटूर कांग्रेस समिति के वे अध्यक्ष चुने गये और इसके साथ ही तमिलनाडु में कांग्रेस की कार्य समिति में भी उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान मिला।

जिस समय देश स्वतंत्र हुआ था, खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी, परन्तु आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है। देश की स्वतंत्रता से पूर्व भारत के अनेक स्थानों पर अनेक बार अकाल पड़े और बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अनेक लोग भुखमरी के शिकार हुए, परन्तु स्वतंत्रता के बाद ऐसा कोई अवसर नहीं आया, जब देश में अकाल की स्थिति पैदा हुई हो।

जब सी. सुब्रह्मण्यम केन्द्र सरकार के कृषि मंत्री बने तो उन्होंने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक ऐसी योजना का विकास किया, जिसके कारण देश के किसानों में ऐसी जागृति आई कि वे अच्छे बीज और खाद का बेहतर ढंग से उपयोग करने लगे।

उनके मंत्रित्व काल में ही खाद्यान्न की नई किस्मों का विकास किया गया। इस काल में ही विभिन्न प्रकार के उर्वरकों का किसानों ने उपयोग करना शुरू किया। इस कार्य की प्रशंसा नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नार्मन बोरलाग ने भी मुक्त कण्ठ से की है।

सी. सुब्रह्मण्यम की कृषि नीतियों के कारण 1972 में खाद्यान्न का जो रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, इस घटना को 'हरित क्रांति' की संज्ञा दी गई। कृषि नीति में आपके योगदान के लिए डॉ. बोरलाग का कहना है कि "सी. सुब्रह्मण्यम की दूर-दृष्टि और प्रभाव के कारण कृषि सम्बन्धी यह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। किसी भी कार्य के लिए जो राजनीतिक निर्णय लिए जाते हैं, 

1962 में लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद सी. सुब्रह्मण्यम केबिनेट स्तर के मंत्री बनाये गए। इनके अधीन इस्पात मंत्रालय था। 

1963-1964 तक इस्पात के साथ-साथ खान और भारी इंजीनियरिंग मंत्री भी रहे। फिर 1964 से 1965 तक वे खाद्य और कृषि मंत्री रहे। 1966-1967 में उनके मंत्रालय के साथ समुदाय विकास और सहयोगिता विभाग भी जोड़ दिया गया। उनका यह कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

उन्होंने जहाँ अच्छे बीजों की बढ़िया किस्मों का उपयोग करने पर बल दिया, वहाँ किसानों को इस ओर भी प्रेरित किया कि वे खाद का भी और अधिक प्रयोग करें। इसका परिणाम यह हुआ कि 1960 के दशक में देश खाद्य उत्पादन में आत्म निर्भर हो गया।

सी. सुब्रह्मण्यम को तुलसी फाउण्डेशन के अतिरिक्त 'ऊ थांट' शांति पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करने के कारण उन्हें 'वाइ.एस. चौहान' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिर उन्हें सर्वोच्च भारतीय सम्मान 'भारत रत्न' से 1988 में सम्मानित किया गया। 7 नवम्बर, 2000 में सुब्रह्मण्यम जी का निधन हुआ।


BY : Abdul Mannan


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